विपक्षी खेमे के कुछ बड़े नेताओं ने बिना किसी ठोस सबूत के इस हादसे को “साजिश” करार देना शुरू कर दिया। ममता बनर्जी और मल्लिकार्जुन खरगे ने सीधे-सीधे केंद्र सरकार पर संदेह जताते हुए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग कर दी। सवाल यह नहीं है कि जांच हो या नहीं—जांच हर हादसे में होती है। सवाल यह है कि शोक की घड़ी में शक और आरोपों की राजनीति क्यों?
दिलचस्प बात यह है कि अजित पवार के अपने चाचा और वरिष्ठ नेता शरद पवार ने इस घटना को एक दुखद दुर्घटना बताते हुए साफ कहा है कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। जब परिवार का सबसे अनुभवी नेता संयम और संवेदना की बात कर रहा है, तब विपक्ष का एक वर्ग इस त्रासदी को मोदी-विरोध की स्क्रिप्ट में क्यों ढाल रहा है?
यह पहली बार नहीं है जब किसी हादसे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब विपक्ष के पास लाशों पर राजनीति के अलावा कोई नैतिक रास्ता नहीं बचा? जनता सब देख रही है और शायद अब फैसला भी वही करेगी—कि संवेदना बड़ी है या सियासत
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