अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘गाजा पीस बोर्ड’ में शामिल होने का औपचारिक न्योता भेजकर एक नई कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। इसे वॉशिंगटन की ओर से भारत के लिए सम्मान बताया जा रहा है, लेकिन कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे अमेरिका की जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश मान रहे हैं।
आलोचकों का कहना है कि अमेरिका गाजा संकट में अपनी नीतिगत विफलताओं का बोझ भारत जैसे देशों के कंधों पर डालना चाहता है। जिस अमेरिका ने पहले भारत के नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) से दूरी बना ली थी, वही आज गाजा में शांति प्रक्रिया के लिए भारत की भूमिका तलाश रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन की यह पेशकश ‘बराबरी की साझेदारी’ नहीं बल्कि सुविधा आधारित कूटनीति है। याद दिलाया जा रहा है कि ट्रंप ने अपने कार्यकाल में पेरिस जलवायु समझौते से भी अमेरिका को बाहर कर लिया था, जिससे वैश्विक सहयोग को झटका लगा था।
लेखक ज्ञानेंद्र मिश्रा का तर्क है कि भारत को श्रीलंका जैसे अनुभवों से सबक लेना चाहिए, जहां क्षेत्रीय शांति पहलों में उसकी भूमिका जटिल साबित हुई थी। उनके अनुसार, गाजा संघर्ष ऐतिहासिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है और इसमें भारत की प्रत्यक्ष भागीदारी उसे अनावश्यक विवादों में खींच सकती है।
फिलहाल भारत सरकार की ओर से इस निमंत्रण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि नई दिल्ली सावधानीपूर्वक रुख अपनाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत मानवीय सहायता का समर्थन कर सकता है, लेकिन ‘गाजा पीस बोर्ड’ जैसी संरचनाओं में औपचारिक भागीदारी पर उसे स्पष्ट और सख्त रुख लेना चाहिए।
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