यह प्रणाली 300 किलोवाट श्रेणी के हाई-एनर्जी लेजर पर आधारित होगी, जिसकी प्रभावी रेंज 20 किलोमीटर से अधिक मानी जा रही है। यह ड्रोन, क्रूज मिसाइल, लोइटरिंग म्यूनिशन और यहां तक कि लड़ाकू विमानों जैसे खतरों को सटीकता से निशाना बना सकेगी। खास बात यह है कि इसमें प्रति शॉट लागत बेहद कम होगी और यह पारंपरिक जामिंग या इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेज़र्स से अप्रभावित रहेगी।
DRDO ने इस परियोजना के लिए जरूरी कई प्रमुख तकनीकों का सफल परीक्षण कर लिया है, जिनमें एडवांस्ड बीम डायरेक्शन सिस्टम, थर्मल कंट्रोल मैकेनिज्म और लॉन्ग रेंज ट्रैकिंग असेंबली शामिल हैं। यह सिस्टम बदलते मौसम, धूल-धुएं और वायुमंडलीय बाधाओं के बीच भी प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा।
समानांतर रूप से भारत अपने मौजूदा एयर डिफेंस ढांचे को मजबूत करने के लिए आकाश-NG और S-400 सिस्टम भी तैनात कर रहा है, जबकि भविष्य में रूसी S-500 खरीदने की संभावना पर भी विचार चल रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लेजर आधारित रक्षा तकनीक भविष्य के युद्ध का मुख्य आधार बनने जा रही है और भारत इस क्षेत्र में चुनिंदा उन्नत देशों की कतार में शामिल हो रहा है।
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