धार्मिक नगरी उज्जैन को प्रायः महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए जाना जाता है, लेकिन क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित मंगलनाथ मंदिर भी अपनी पवित्रता और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है। यह मंदिर खास तौर पर उन श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जिनकी कुंडली में मंगल ग्रह का प्रभाव प्रबल माना जाता है या जो मंगल दोष से ग्रस्त होते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, उज्जैन को मंगल ग्रह की जननी कहा गया है। मान्यता है कि क्षिप्रा नदी के किनारे ही मंगल ग्रह का जन्म हुआ था। इसी विश्वास के चलते मंगलनाथ मंदिर को मंगल दोष शांति और ग्रह बाधा निवारण का सबसे प्रमुख स्थल माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां मंगल शांति, भात पूजा और अन्य विशेष अनुष्ठान कराने पहुंचते हैं।
मंगलनाथ मंदिर का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि खगोलीय दृष्टि से भी अत्यंत खास है। यह मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है और माना जाता है कि भारत में यह एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां से कर्क रेखा गुजरती है। इसी कारण उज्जैन को देश का नाभि स्थल भी कहा जाता है। प्राचीन काल में यहां से ग्रहों और नक्षत्रों की गणना की जाती थी।
मंगलनाथ मंदिर में मंगल देव की पूजा भगवान शिव के स्वरूप में की जाती है, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों में मंगल को भगवान शिव और पृथ्वी का पुत्र बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां की गई पूजा से विवाह में आ रही बाधाएं, भूमि विवाद और जीवन की अनेक समस्याएं दूर होती हैं।
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